शिव कुमार दीपक के दोहे  - दोहा कोश

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गुरुवार, 12 जनवरी 2023

शिव कुमार दीपक के दोहे 

शिवकुमार दीपक के दोहे 

देवर को भाभी बड़ी, ईश्वर का उपहार।
सीता जैसी भाभियाँ, देती माँ का प्यार।।

दुश्मन कन्या भ्रूण के, सभी नीच अज्ञान।
मत दो उनके पूत को, अपनी कन्या दान।।

जब से माँ को ले गया, छीन हाथ से काल।
मातृ दुआ से जी रहा, माता तेरा लाल।।

इज्जत, दौलत, घर, अना, सौम्य, सुधारस बैन।
जो कुछ मेरे पास है, सब कुछ माँ की देन।।

अनपढ़, सभ्य, सुशील माँ, साक्षर जैसा ज्ञान।
तिमिर युद्ध का दे गई, दीपक को वरदान।।


काम, क्रोध, मद मोह अरु, लालच रहित शरीर।
दीपक उसको मानिये, सच्चा संत फकीर।।

कलयुग के इस दौर में, जी सर, यस सर बोल।
मिले तरक्की जॉब में, चापलूस का मोल।।

कोठी वाले गेट पर, खड़ा मिला इन्सान।
लेकिन ऊँची कोठियाँ, बेच चुकी ईमान।।

चाहे ज्ञानी वेद का, चाहे हो बलवान।
सम्मुख वह भगवान के, होता शून्य समान।।

चुप रह, सुन ले बावले, तन मन धन तू वार।
वरना भेजे जेल में, नारी का अधिकार।।

नहीं प्रेम फुटपाथ से, मन में बुरे विचार।
टक्कर देकर जा रही, वी.आई.पी. कार।।

खीर बना उत्कोच की, चाट रहे जो लोग।
लिखता नहीं विरोध में, क्यों उनके अभियोग।।

कर्म बिना खुलता नहीं, किस्मत का दरबार।
फिर भी किस्मत पर टिका, आधा-सा संसार।।

दीप जले थे रात भर, करते रहे प्रकाश।
दूर-दूर मावस रही, सारी रात उदास।।

रहता हरदम तन सुखी, मन में खुशी अपार।
हँस लेता जो आदमी, यदि दिन में दस बार।।

सदाचार की चोटियाँ, चढ़ा नहीं अभिमान।
झुककर चलता जो पथिक, चढ़ जाता चट्टान।।

सबसे सुन्दर ताज को, माने ये संसार।
उससे भी सुन्दर यहाँ, तेरा मेरा प्यार।।

दावा जिसका जीत का, पाई उसने हार।
पानी-पानी हो गया, जो था पानीदार।।

लेना-देना कर्ज का, कड़े सूद के साथ।
दोनों में से एक को, मलने पड़ते हाथ।।

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