आचार्य भगवत दुबे के दोहे  - दोहा कोश

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गुरुवार, 12 जनवरी 2023

आचार्य भगवत दुबे के दोहे 

आचार्य भगवत दुबे के दोहे 

पर्यावरण बिगाडक़र, दिया प्रदूषण थोप।
सूखा, रोग, अकाल से, प्रकृति जताये कोप।।

हरे वनों को कर रहे, काट-काट वीरान।
जंगल अब तपने लगे, जैसे रेगिस्तान।।

राख धुँआ पैट्रोल की, भरे नाक में गंध।
जंगल काटे, मृत्यु का, खुद कर लिया प्रबंध।।े

जड़ी-बूटियाँ फूल-फल, शीतल पवन प्रचार।
बिना स्वार्थ करते सद, वृक्ष बड़ा उपकार।।

फूल खिलें मुस्कान के, शीतल बहे सुगंध।
करें स्वस्थ तन के लिए, पर्यावरण-प्रबंध।।

निरपराध पर्यावरण, हुआ जेल में बंद।
आज प्रदूषण होगा, अपराधी स्वच्छंद।।

शीतल जल की छागलें, सूख गईं सब झील।
निर्वासित वन से हुए, सीधे पादप भील।।

रही न मादल में गमक, टिमकी में टनकार।
माँगे से मिलता नहीं, अब मधुमास उधार।।

ज्यों ठंडी रातें हुईं, जली विरह की आग।
यादों के डसने लगे, इच्छाधारी नाग।।

जब होता वार्धक्य में, जर्जर रुज्ण शरीर।
असर दिखाती तब अधिक, प्रिय-वियोग की पीर।।

मृत्युदंड से भी दुसह, जग में प्रिया-वियोग।
इस पीड़ा को जानते, चातकव्रत के लोग।।

यशोधरा रातें हुई, गौतम बुद्ध प्रभात।
बिना तुम्हारे हो गये, राहुल स्वप्र अनाथ।।

खोली गई अतीत की, दीमक लगी किताब।
आँखें गीली कर गया, सूखा हुआ गुलाब।।

प्रणय पुस्तिका में जहाँ, लिखना था संयोग।
वख्त प्रकाशक छापकर, लाया वहीं वियोग।।

समय जुलाहे को दिया, मन का शुद्ध कपास।
पतझर तो बुनकर दिया, दिया नहीं मधुमास।।



 

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