डॉ नलिन के दोहे हंसपंखिनी है सुबह, मोरपंखिनी शाम। स्वर्णपंख झलका रही, बीच-बीच में घाम।। सिमट गया तो अणु हुआ, फैला तो आकाश। कण-कण में ज्...
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शनिवार, 14 जनवरी 2023
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