स्नेहलता ‘नीर’ के दोहे आसमान से गिर रहे, रत्न असंख्य अनूप। भोर तृणों की नोक पर, चमके पाकर धूप।। यहीं बनी हैं जातियाँ, यहीं बने सब धर्...
स्नेहलता ‘नीर’ लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
स्नेहलता ‘नीर’ लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
शुक्रवार, 13 जनवरी 2023
!—end>!—start>