डॉ.किशोर काबरा के दोहे  - दोहा कोश

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गुरुवार, 12 जनवरी 2023

डॉ.किशोर काबरा के दोहे 

डॉ.किशोर काबरा के दोहे 

बम फूटा, चिथड़े उड़े, खण्हर हुए मकान।
चिंदी-चिंदी हो गए, बापू के अरमान।।

शाहजहाँ पाते रहे, यहाँ तख़्त औ ताज।
किसी-किसी के भाज्य में, होती है मुमताज।।

कलियुग में श्रीराम का, कैसे हो परित्राण।
स्पर्श अहल्या का मिला, राम हुए पाषाण।।

पहुँच गया है चाँद तक, पश्चिम का विज्ञान।
रोटी तक पहुँचा नहीं, पूरब का इन्सान।।

तुम उतने सीधे लगे, जितने सीधे बाँस।
पोर-पोर में गाँठ है, रोम-रोम में फाँस।।

किससे पूछेंगे यहाँ-जीवन किसका नाम।
जन्म-मृत्यु के बीच में, केवल अल्प विराम।।

सभी दुश्मनों से कहो, मेरा क्या विश्वास।
जब तक मेरी राख हो, रहें चिता के पास।।

बरगद जैसी देह हो, पीपल जैसे प्राण।
तुलसी जैसी बुद्धि हो, जो जीवित निर्वाण।।

उलझ गया संसार में, कैसे पाऊँ छोर।
सुलझा दो इस गाँठ को, मेरे नन्दकिशोर।।

मंदिर से मस्जि़द बनी, मस्जि़द से मैदान।
पत्थर में ही खो गया, मेरा हिन्दुस्तान।।

बात बनावें घर भरें और डूबावें देश।
नेता में अवतरित हैं, ब्रहमा, विष्णु, महेश।।

भूख, गरीबी, काहिली, लूट-पाट, आतंक।
भारत के माथे लिखे, यही भाज्य के अंक।।

अनावृष्टि-अतिवृष्टि ही, अब तक मुझको याद।
सुधावृष्टि देखी नहीं, आजादी के बाद।।

तुम कहत-दीवार ने, बाँट दिए परिवार।
अरे, यही दीवार तो साझे का आधार।।

हम बच्चों को किस तरह, करते हैं तैयार।
उन्हें खिलौनों की जगह, थमा रहे हथियार।।

बादल, बिजली, इन्द्रधनुष-सब हैं थोथी बात।
मन का पानी मर गया, कैसे हो बरसात।।

हम तो जाते तीर्थ में, होने को निष्पाप।
तीर्थ भला जाये कहाँ, लेकर सबके पाप।।

गीत लिखे, $गज़लें लिखी, लिखे छंद स्वच्छन्द।
जब मैंने खुद को लिखा, कलम हो गई बंद।।



 

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