दिनेश रस्तोगी के दोहे  - दोहा कोश

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गुरुवार, 12 जनवरी 2023

दिनेश रस्तोगी के दोहे 

दिनेश रस्तोगी के दोहे 

माला, कंठी, गेरुये, वस्त्र पहनकर बाज।
जन-चिंता में घूमते, बस कुर्सी के काज।।

जब चुनाव का दौर हो, क्या शकुनी क्या कंस।
भ्रष्टों में भी भ्रष्ट अब, बगुले दिखते हंस।।

कुछ करनी कुछ करम गति, कुछ चुनाव की आन।
दो कौड़ी का आदमी, पा जाये सम्मान।।

तिल-भर जो अवसर मिला, खाया उसने ताड़।
राजा के भी दिन फिरे, घर हो गयी तिहाड़।।

बाहरखाने दोस्ती, भीतर चुभते शूल।
पारंगत हर क्षेत्र में, ये दोगले उसूल।।

पंडित माँगे शान्ति, मूल्ला माँगे खैर।
राजनीति में एक रंग, चौखा केवल वैर।।

कौए वैरागी दिखे, बक दिख रहे महंत।
चमगादड़ दिखने लगे, डाल-डाल श्रीमंत।।

तुच्छ मानसिकता लिये, आडंबर की ओट।
स्वारथ ने लिखवा लिया, सज्जन से प्रानोट।।

राजपथों पर ऐश का, ऐसा फैला जाल।
जनपथ बंजर हो गया, पडऩे लगा अकाल।।

सत्ताबल और बाहुबल, धनबल-वंशजवाद।
इन चारों ने कर दिया, लोकतंत्र बरबाद।।

मोक्ष दायिनी थी कभी, गंगा अब निरुपाय।
जल को दूषित कर रहा, खुद मानव-समुदाय।।

अर्थ-व्यवस्था के हुए, दोनों गुर्दे फेल।
डायलिसिस पर देश है, डॉलर का सब खेल।।

संसद के आंगन हुआ, लोकतंत्र बाजार।
हुई सियासत बेहया, नोटों की बौछार।।

जब लंगडे के हाथ में, हो बहरे की डोर।
अंधे की रंगरेलियाँ, कौन मचाये शोर।।

दिन बबूल के शूल से, नागफनी हर रात।
आख़िर क्यों पैदा किए, तुमने ये हालात॥


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