पीयूष कुमार द्विवेदी ‘पूतू’ के दोहे  - दोहा कोश

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शुक्रवार, 13 जनवरी 2023

पीयूष कुमार द्विवेदी ‘पूतू’ के दोहे 

पीयूष कुमार द्विवेदी ‘पूतू’ के दोहे 

न्यायालय है आपका, हाकिम भी हैं आप।
टूट गईं आशा सकल, लगे जिंदगी शाप।।

रीत निराली प्रेम की, होती है लो जान।
जिसके खातिर मर मिटे, उसे न होता भान।।

प्रीत निभाना है कठिन, मान रहे सब लोग।
आग-नीर का हो नहीं, कभी यहाँ संयोग।।

पास हमारे आ गये, लेकिन दिल से दूर।
अपना कहने के लिए, ‘पूतू’ है मजबूर।।

द्वार सफलता के खुलें, गुण गाए संसार।
श्रम से जिस इंसान को, हो जाता है प्यार।।

घोल हलाहल वो रहे,जिनको पाना वोट।
पर हम रह सौहार्द से,कर दें उलटी चोट।।

मीत सभी होते नहीं,कृष्ण सुदामा जान।
कुछ तो करते मित्रता,सिर्फ लोभ अनुमान।।

देखो कर पतवार ले,बैठे मेरे पास।
पार कराएँगे नहीं, ‘पूतू’ है विश्वास।।

अपना भारत देश जो, लगे सुरक्षित आज।
हर पल सेवारत् रहें, दृढ़ता से जांबाज।।

जो फर्जी विकलांग हैं, लाभ कर रहे प्राप्त।
सच्चों के मन इसलिए, घोर निराशा व्याप्त॥

शब्द बदलने से नहीं, कोई दिखे सुधार।
तरस रहे विकलांगजन, मिले नहीं अधिकार॥

दया-घृणा की दृष्टि से, देखे हमें समाज।
जैसा था विकलांग कल, वैसा ही है आज॥

वोट बैंक विकलांग हैं, रही पार्टियाँ मान।
कौन इलेक्शन बाद फिर, रखता उनका ध्यान॥

सहें उपेक्षा सब जगह, घर बाहर परिवार।
घुट-घुटकर विकलांग को, जीने का अधिकार॥

कई बार विकलांग का, शोषक हो विकलांग।
खुशी उन्हें मिलती बड़ी, खींच पराई टाँग॥

‘पूतू’ अपना हो गया, छद्ममयी व्यवहार।
बेटी मारें कोख में, देवी की जयकार।।

पारा गरमी का चढ़े, देख दिनोंदिन और।
इससे बचने का नहीं, दिखता कोई ठौर।।

कच्चे-कच्चे दिल हुए, पक्के हुए मकान।
पहले जैसी अब नहीं, रही गाँव की शान।।

जितना जो विकलांग है, उतना ही हैरान।
पग-पग पर संसार से, पाता है अपमान।।

अन्न दान दे कर्ज का, पाता है उपहार।
अपने भारत देश का, हलधर है लाचार।।

बेटी बैठी ब्याह को, सुत की फटी कमीज।
खुद पर कृषक निकालता, अपने मन की खीज।।

कोई पाया तीन बस, कोई रूपया चार।
ऋ ण माफी के पत्र में, गलती कई हजार।।

जब होती है हाथ में, सस्ती बिकती प्याज।
‘पूतू’ हलधर सोचता, क्यों है महँगी आज।।

खून-पसीना एक कर, पैदा करता अन्न।
सड़ता जब मैदान में, हलधर होता सन्न।।

ए.सी. में यूँ बैठकर, सोचें आप निदान।
जीते हुए अभाव में, मरते रहें किसान।।

खून-पसीना एक कर, पैदा करता अन्न।
लेकिन रहता देखिए, सदा किसान विपन्न।।

अपनी पूरी जिंदगी, देता खपा किसान।
भाग्य भरोसे जी रहा, कौन भला दे ध्यान।।

होरी जीते देश में, पाले स्वप्न अनेक।
बीते पूरी जिंदगी, पूर्ण न होते एक।।

महँगा बीज खरीदते, और कीमती खाद।
बिके किंतु सस्ती फसल, होता तब अवसाद।।

माटी मिश माटी हुआ, माटी पूत किसान।
माटी से ममता बड़ी, बसती माटी जान।।

खेतों में होने लगे, ‘पूतू’ फसल जवान।
नाचे हृदय किसान का, छाए मुख मुस्कान।।

मिट्टी से सोना करे, पैदा यहाँ किसान।
खुशी-खुशी सबको करे, सदा अन्न का दान।।

उस पर हैं निर्भर सभी, पशु-पक्षी-इंसान।
रूप दूसरा ईश का, होता जगत् किसान।।

एक घड़ी जाया कभी, करता नहीं किसान।
यही कर्मयोगी बड़ा, जाने सकल जहान।।

कहीं सुनामी का कहर, और कहीं भूचाल।
रूप प्रकृति का देखिए, कितना है विकराल॥

रिश्तों में चलने लगा, दुश्मन वाली चाल।
बाहर से भोला मगर, कितना है विकराल॥

बैठा जिस पर देखिए, वही काटता डाल।
मानव करता काम यूँ, कितना है विकराल॥

चौराहे पर खिंच रहा, अब पंचाली चीर।
खुद में मोहन मस्त हैं, किसे सुनाए पीर॥

मिले किसी को दूध ना, कोई चाभे खीर।
देख-देख दिल रो रहा, किसे सुनाए पीर॥

दुखिया हैं माता-पिता, मनवा बड़ा अधीर।
किया सुतों ने जो अलग, किसे सुनाएँ पीर॥

कौन यहाँ सुनता भला, रहा नहीं मन धीर।
सबने मुझको है ठगा, किसे सुनाए पीर॥

बेटी मारें गर्भ में, और पूजते शक्ति।
‘पूतू’ कैसा धर्म है, कैसी है यह भक्ति॥

मुझे न मारें गर्भ में, बेटी करे पुकार।
मेरी क्षमता को ज़रा, करें आप स्वीकार॥

उनके लिए समान है, नया-पुराना साल।
जो खाते रोटी-नमक, मिले न जिनको दाल॥


 

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