डॉ. शील कौशिक के दोहे  - दोहा कोश

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गुरुवार, 12 जनवरी 2023

डॉ. शील कौशिक के दोहे 

डॉ. शील कौशिक के दोहे 

ऊँचे भवनों से घिरा, अदना एक मकान।
धूप छीनते और की, खुद को कहें महान।।

मैया के हर झूठ पर, आता मुझको प्यार।
भूखी रह कर भी कहे, पेट भरा सुकुमार।।

पहली बारिश झर रही, धो डाली सब धूल।
बूढी माँ चूल्हा ढके, बिटिया झूले झूल।।

बूढ़ा पीपल सुन रहा, मनभावन पदचाप।
सींच गई जल से उसे, इक बेटी चुपचाप।।

अक्षर-अक्षर पढ़ सकूं, जैसे एक किताब।
अंतिम पन्ने तक चले, तेरा-मेरा ख्वाब।।

नहीं लेखनी लिख सकी, मेरे मन की पीर।
खत उसका आया नहीं, दिन भर रही अधीर।।

चिठ्ठी के हर शब्द से, झरता माँ का प्यार।
जैसे पर्वत से गिरे, निर्झर निर्मल धार।।

अपनी धुन में घूमती, इधर-उधर ज्यों पौन।
इठलाती युवती फिरे, रोके-टोके कौन।।

सच तो केवल सच रहे, सच के रूप अनेक।
नैनों में से झांक कर, उछले एकाएक।।

माँ तो माँ है गर गुनो, उसका धर्म न जात।
क्या भारत क्या पाक की, सहे बराबर घात।।

कुदरत ने हमको दिए, खुशबू सुंदर रंग।
बदकिस्मत इंसान को, मिले न इनका संग।।

नील गगन की चाह में, उडऩे चली पतंग।
प्रेम पत्र वह सौंपती, संग निराले रंग।।

टेढ़ी होगी नींव तो, टेढ़ी बने दीवार।
घुट्टी में ही दीजिए, बच्चों को संस्कार।।

मेघों के कंधे चढ़ी, धरा सींचने बूँद।
हर्षित बिटिया झूमती, अपनी आँखे मूँद।।

दिनकर किरणें झांकती, कोहरा पहुँचा पार।
चिडिय़ा देखो उड़ चली, अपने पंख पसार।।

सूखी  सी इक डाल पर, चिडिय़ा करे पुकार।
सपने हरियल शाख के, कैसे लें आकार।।

बिगड़े इस तूफान की, कब तक सहता मार।
आखिर पंछी उड़ चला, सात समन्दर पार।।

चिडिय़ा अब न बोलती, सूख चुके सब पेड़।
बोलो कुदरत से भला, किसने की है छेड़।।

जब से डाली देख ली, बिन पत्ते बिन फूल।
सांसें हैं उखड़ी हुई, सब कुछ है प्रतिकूल।।

कैसा तिलिस्म रच रही, टंगी तार पर बूँद।
आह्लादित हो देखती, चिडिय़ा आँखे मूँद।।

नीर भरे बादल चले, आ बरसेंगे गाँव।
हवा निगोड़ी ले गई, टिकने दिए न पाँव।।

चुपके-चुपके कह गई, पवन प्रेम की बात।          
बादल के सँग आ रही, बूंदों की बारात।।

आसमान आँगन बना, बादल खेलें खेल।
आगे-पीछे दौड़ते, होते रेलमपेल।।

मेघों के कंधे चढ़ी, धरा सींचने बूँद।
हर्षित बिटिया झूमती, अपनी आँखें मूँद।।

मन में बहुत प्रश्न उठे, सभी रह गये मौन।
इनको पूर्णविराम में, बदल गया है कौन।।

नहीं लेखनी लिख सकी, मेरे मन की पीर।
उसका खत आया नहीं, दिन भर रही अधीर।।

पानी पर लिखना कभी, हुआ नहीं आसान।
हसरत दिल की अनगिनत, कब चढ़ती परवान।।

इतना क्यों है सोचता, बन्दा बारम्बार।
जीवन जिसने है दिया, उसके सिर ही भार।।

हर कोई उतरे-चढ़े, ऐसी सीढ़ी वक्त।
चोटी पर इक ही रहे, यहाँ नियम हैं सख्त।।

लिपा-पुता चेहरा सजा, दिखे न कोई भाव।
एक जरा सी बात पर, पल में आये ताव।।


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