अशोक कुमार रक्ताले के दोहे दबी हुई इक चाह थी, या थी उसकी भूल। पनपाया फिर ओस ने, काँटों भरा बबूल।। लोभ बढे रज भाव से, मन में ले विस्ता...
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शुक्रवार, 13 जनवरी 2023
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