प्रदीप दुबे 'दीप' के दोहे होरी बैठा खेत में, डंठल रहा सकेल। बूटे-बूटे खा गए, राजाजी के बैल।। कहां प्रीत की माधुरी, कहां नेह की गंध। ...
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रविवार, 15 जनवरी 2023
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