मनोज जैन 'मधुर' के दोहे
किश्तों में जीवन कटा, घटी उमर की नाप।आभासी युग ने दिए, हमें नये अभिशाप।।
समझ न मुझको नासमझ, और न दर्शक मूक।
काँधे पर रख और के, चला नहीं बंदूक।।
दल सब होते एक से, किसे कहें हम नेक।
पाकर सत्ता-सुन्दरी, खोते सभी विवेक।।
आदर्शों को इस तरह, मिला यहाँ सम्मान।
गणिका खुलकर खींचती, शीलव्रता के कान।।
पच्चीकारी में निपुण, लालगंज का चोर।
अंधकार को कह रहा, उजली उजली भोर।
एक तीर से कर दिए, तुमने कई शिकार।
लाठी भी टूटी नहीं, दिया सांप भी मार।।
नहीं किसी के पास भी, मिली तुरुप की काट।
बौने को घोषित किया, सबने यहाँ विराट।।
पंडित जी चालाक हैं, बेहद चालू शेख।
तेल डाल कर आग में, रहे तमाशा देख।।
हवा संटियाँ मारती, सूरज फेंके आग।
घबराकर जाने कहाँ, छाँव गई है भाग।।
पत्थर बोला चीखकर, आकर मुझे तराश।
मुझ में भी भगवान है, ढूंढा होता काश!।।
मानेगा कवि मंच का, करके बेड़ा गर्क।
कविता जाए भाड़ में, किसको पड़ता फर्क।।
कहो निराला तुम मुझे, तुमको बोलूँ पंत।
दूर दूर तक हो नहीं, खुशफहमी का अंत।।
सब दुख सहते मौन रह, करते नहीं सवाल ।
कौन साधना योग से, करते आप कमाल।।
कठपुतली हम हैं नहीं, हम न स्वचालित यंत्र।
रहने दो भाई हमें, थोड़ा बहुत स्वतंत्र।।
बांग न दे तो भी यहाँ, होगी सुबह ज़रूर।
मुर्गे! अपनी बाँग पर, मत हो यों मग़रूर।।
चक्री ही चारण हुए, हुए क्षत्रपति भाट।।
छल के सम्मुख टेकते, घुटने और ललाट।।
चंदन से आई नहीं,जिनको कभी सुगंध।
वे ख़ुशबू पर लिख रहे, अपना शोध प्रबन्ध।।
मन्दिर में अस्मत लुटी, देख रहा भगवान।।
जीवन भर को खो गई, नन्हीं सी मुस्कान।
देखे हमने दोगले, साधो! यहाँ चरित्र।
दुश्मन से भी जा मिले, अपने भी हैं मित्र।।
नेता सब चारण हुए, छुट भैये सब भाट।
दीमक बन कर देश की, रहे प्रतिष्ठा चाट।
बहन-बेटियों संग भी, करते हैं दुष्कर्म !
कितने नीचे गिर गये, मित्रो मज़हब-धर्म ?
अब भी चर्चा में यहाँ, है पंचायत खाप।
हाथों में कानून ले, लिखती जो अभिशाप।।
आखिर तुझको क्यों लगा, मेरा दोहा तीर।
क्या तूने मारी नहीं, शब्दों की शमशीर।।
इससे ज्यादा और भी, क्या होगा अंधेर।
जब सियार को कह रहे, सारे गीदड़ शेर।।
दिया किसी को चंद्रमा, दिया किसी को व्योम।
बहुमत हासिल कर रहा, राजा नया शिवोम।।
अद्भुत चिंतन है सखे, अद्भुत बिम्ब विधान।
कहता घटिया काव्य को, कालजयी शैतान।।
अद्भुत चिंतन है सखे, अद्भुत बिम्ब विधान।
कहता घटिया काव्य को, कालजयी शैतान।।
चक्र व्यूह में जा घिरा, अभिमन्यू स्वयमेव।
टुकुर टुकुर बस देखते, सारे रक्षक देव।।
गधे पँजीरी खा रहे, कुत्ते खाते खीर।
बटी प्रजा में इस तरह, राजा की जागीर।।
खाल ओढ़कर शेर की, बोले गीदड़ चंद।
जंगल अपने बाप का, विचरें सब स्वच्छंद।
दंग हुए वोटर सभी, उड़े सभी के होश।
जय पाकर नेता हुआ, कछुआ से खरगोश।।
जाड़ा चाबुक पीठ पर, मार रहा दिन रैन।
झोपड़ियों के हो रहे, सावन भादौं नैन।।
कविता में मत खोजना, तुम द्राविड़ व्यायाम।
हमको तो इसमें मिले, जीने के आयाम।।
माह सभी हैं एक से, क्या अप्रिल क्या जून।
शासक आदमखोर है, सत्ता पीती खून।।
कहने में अब डर लगे, किसको कह दूँ खास।
खण्ड खण्ड होने लगा, इस मन का विश्वास।।
तुमने छल का प्रीत में, ऐसा मारा दंश।
घाव भले भर दे समय, बचा रहेगा अंश।
रोड़ा ईंटें माँग लीं, इधर उधर से अन्न।
इसी तरह होती रही, भानुमती सम्पन्न।
तेरे मन में चोर है, मेरे मन में शाह।
चाहे जितना लूटले, मुझे नहीं परवाह।।
शासक आदमखोर है, सत्ता पीती खून।।
कहने में अब डर लगे, किसको कह दूँ खास।
खण्ड खण्ड होने लगा, इस मन का विश्वास।।
तुमने छल का प्रीत में, ऐसा मारा दंश।
घाव भले भर दे समय, बचा रहेगा अंश।
रोड़ा ईंटें माँग लीं, इधर उधर से अन्न।
इसी तरह होती रही, भानुमती सम्पन्न।
तेरे मन में चोर है, मेरे मन में शाह।
चाहे जितना लूटले, मुझे नहीं परवाह।।
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