विजेंद्र शर्मा के दोहे  - दोहा कोश

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गुरुवार, 12 जनवरी 2023

विजेंद्र शर्मा के दोहे 

विजेंद्र शर्मा के दोहे 

इतना हमें नवाज़ दे, मौज रहे भरपूर।
इतना भी मत दीजियो, मन में आय गुरूर।।

लिखने को फिर क्या बचा, $गालिब तेरे बाद।
हम यूँ ही करते रहे, कागज को बर्बाद।।
 
मर्यादा की पालना, लाख टके की चीज।
अपनी सीमा में रहो, लाँघो मत दहलीज़।।

भावुकता वरदान है, तभी आँख में नीर।।
समझो जग की पीर को, हो जाओगे पीर।।

क्या -क्या हमको दे गय , तुलसी मीरा सूर।
नस्ल हमारे दौर की, इनसे भागे दूर।।

बिन सोचे ही हो गया, इसी लिए है प्यार।
करता गर मैं सोच के, फिर था कारोबार।।

पापा मेरी चाँद को,  छूने की है चाह।
दिन है खेलन के यही, मत कर मेरा ब्याह।।

जिसको भी मौका मिला, उसने भर ली जेब।
लोग अदब के नाम पे, देते रहे फरेब।।

दे जाता है वक़्त भी, क्या-क्या हमको सीख।
देता था खैरात जो, वो अब माँगे भीख।।

जिसकी ख़ातिर ओढ़ ली, हमने यार ज़मीन।
उसको आया ही नहीं , हम पे कभी य$कीन।।

दिल में उसकी याद है, आँखों में है नीर।
यार हमारे पास है, बहुत बड़ी जागीर।।

एक बार जब इश्$कका, दिल पर चढ़े सरूर।
कौन भला फिर मानता, दुनिया का दस्तूर।।

सम्बन्धों की राह में, आये ऐसे मोड़।
कभी-कभी मन यूँ करे, नाते दूँ सब तोड़।।

दिन-भर झिक-झिक बॉस की, दफ़्तर लगे कलेश।
घर पर आते ही सुनो, बीवी के उपदेश।।

सच करना था झूठ को, बोले कितने झूठ।
जो मैं सच ही बोलता, आफत जाती छूट।।

इक सच बोला और फिर, देखा ऐसा हाल।
कुछ ने नज़रें फेर ली, कुछ की आँखें लाल।।

तपने से परहेज़ है, छपने का है चाव।
जो दिखलाये आइना, उस पे खाये ताव।।

पहरेदारी मुल्$क की, सौंप हमारे हाथ।
पूरा भारत चैन से, सोये सारी रात।।

कहाँ गई वो लोरियाँ , कहाँ गये वो चाव।
बच्चों ने भी फाड़ दी, कागज वाली नाव।।

शुहरत की आ$गोश में, हुए खूब मशहूर।
पर अपनों से हो गये, यारों कौसों दूर।।

होंठ लगे जब काँपने, करने में इज़हार।
तब नैनों ने ये कहा, मुझको तुमसे प्यार।।

उल्टा-सीधा जो लिखे, मत कह उसे अदीब।
पुस्तक बेचन के लिए, है सारी तर$कीब।।

दिल की चादर तंग है, कहाँ पसारें पाँव।
चलें यार इस शहर से, अपने-अपने गाँव।।

सत्ता पाने के लिए, नित्य नए गठजोड़।
लिया किसी को जोड़ तो, दिया किसी को छोड़।।

ख़्वाब हमारे भी कभी, हो सच में तब्दील।
सपनों में ही काट दी, हमने उमर तवील।।

इश्तिहार के रंग में, रंगा गया अखबार।
$खबर हो गई बे-$खबर, सम्पादक लाचार।।

रौनक रिश्ते में रही, जब तक बोला झूठ।
ज्यों सच बोला त्यों पड़ी, संबंधों में टूट।।

जीवन के आकाश में, हम तो हुए पतंग।
डोर किसी के हाथ में, उड़े किसी के संग।।

जग ज़ाहिर होती नहीं, इस रिश्ते  की थोथ।
भीतर है कड़वाहटें, बाहर करवा चौथ।।

सूने -सूने रास्ते, पसरी-पसरी रेत।
गीले-गीले नैन है, सूखे-सूखे खेत।।

तुझको जो है बोलना, तू जो चाहे बोल।
पर मज़हब के बाट से, भाषा को मत तोल।।

दुख ने सुख से ये कहा, कैसी तेरी जात।
याद खुदा न आये फिर, तू हो जिसके साथ।।

देने वाले कौन हैं, लेने वाले कौन।
ईनामों की बाँट पर, लेकिन सब है मौन।।

सच का अपना खेल है, खेल सके तो खेल।
जलता है सच का दिया, बिन बाती बिन तेल।।



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